बच्चे भी भगवान भरोसे

Gorakhpurगोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की कमी से 36 घंटे के अंदर हुई 30 बच्चों की मौत ने हमारे सरकारी तंत्र की सडऩ को एक झटके में उजागर कर दिया है। इस कांड पर लीपापोती के लिए जो कवायदें चल रही हैं, वे और भी बदतर हैं। एक तरफ कहा जा रहा है कि ऑक्सीजन की कमी के चलते कोई मौत नहीं हुई, दूसरी तरफ यूपी सरकार ऑक्सीजन की सप्लाई रोकने वाली कंपनी के अधिकारियों की गिरफ्तारी में लगी है। हालांकि उपलब्ध दस्तावेज बताते हैं कि कंपनी के बकाये की समस्या पुरानी है। अस्पताल पर उसके 68 लाख से अधिक रुपये बकाया थे, जबकि समझौते के मुताबिक यह राशि 10 लाख रुपये से ज्यादा कभी नहीं होनी चाहिए थी।

न केवल कंपनी की तरफ से लगातार तगादा होता रहा था बल्कि अस्पताल प्रशासन संबंधित विभागों के अधिकारियों को इस बारे में लगातार सूचित भी करता आ रहा था। फिर भी ऊपर से पैसा नहीं आया। दो दिन पहले ही मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी इस अस्पताल के दौरे पर आए थे। बच्चों की मौतें उससे पहले शुरू हो गई थीं। दौरे के दिन भी अस्पताल में 9 बच्चे मरे थे लेकिन मुख्यमंत्री आए और दौरा करके चले गए, बगैर यह जाने कि अस्पताल कैसी बदइंतजामी का शिकार है।

ऐसे दौरों का आखिर मतलब क्या है? मुख्यमंत्री वहां क्या देखने आए थे? बहरहाल, मामला केवल इस एक अस्पताल का नहीं है, न ही उत्तर प्रदेश में यह केवल स्वास्थ्य के क्षेत्र तक सीमित है। सरकारी दायरे में आने वाले सभी क्षेत्रों में कर्मचारियों के वेतन के अलावा लगभग सारे ही खर्चों में भारी कतरब्योंत की जा रही है और सरकारें उनकी दुर्दशा की साफ अनदेखी कर रही हैं। अफसरों का काम नेताओं की चमचागिरी से चल जाता है, जबकि नेताओं के लिए सरकार चलाने का मतलब ही भडक़ाऊ राजनीति करना है। एक पार्टी मनुवाद विरोध का ढोल पीटेगी, दूसरी गोरक्षा और लव जिहाद पर गदर काटेगी, जबकि तीसरी सेक्युलरिज्म की रक्षा में प्राण निछावर कर देने की बात करेगी।
स्कूलों में ब्लैकबोर्ड पर लिखने के लिए चॉक नहीं है, अस्पतालों में ऐम्बुलेंस और थानों में गश्ती गाडिय़ां तेल के बिना खड़ी-खड़ी जंग खा रही हैं, ऐसी छोटी-मोटी बातों की चिंता भला कौन करे? जहां जो कुछ भी चल रहा है, भगवान भरोसे चल रहा है। जहां नहीं चल रहा, वहां तब तक सब कुछ ठीक माना जाता है, जब तक एक साथ हुई बहुत सारी मौतों की खबर लेने के लिए टीवी का कैमरा न पहुंच जाए। गोरखपुर में अबोध बच्चों के इस सरकारी हत्याकांड पर की जाने वाली लीपापोती अगर कामयाब हो गई तो बहुत अच्छा, वरना कुछ छोटी मछलियों को उल्टा लटकाकर सरकार इस इत्मीनान में आ सकती है कि उसके बाकी कृत्यों पर कहीं कोई चर्चा नहीं होने वाली।

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